काळा-काळा बादळा

काळा-काळा बादळा, गांवा-गांवा जाय
खेतां-खेतां बावणी, मोर-पपैया गाय ।।
मोर-पपैया गाय , पाणी ईमरत धारा
बेतो-बेतो जाय , कहावे नंदी नारा
केवाणीकविराज , चाल्या ओरवा वाळा ।।
कोठ्यां भरदो धान, बादळा काळा-काळा ।।



आंबा वाया मोकळा

आम्बा वाया मोकळा , देशी नाक्यो खाद
पोता-पोती खावता , मने करेगा याद ।।
मने करेगा याद , गजब का हा दादाजी
ग्या बेकुंठा माय , कहे धरती माताजी ।।
केवाणीकविराज, होचजो लोग-लुगाया
कुण-कुण करसी याद, थां कई आम्बा वाया ।।


करगेंट्या के न्यान

जीत गयो र जीत गयो , वोटां वाळी जीत ।
ढोल-नगाड़ा आज से , गावे थांका गीत ।।
गावे थांका गीत , खुशबू वाळी माळा ।
या तो मनखां जीत ,था मती करिजो छाळा ।।
के ’वाणी’ कविराज , जा‘गा बारा के भाव ।
करगेंट्या के न्यान ,जो बदल दिया थां भाव ।।






लेखक :- अमृत'वाणी'

कर्जो काळो नाग हे

जाता जाता के गया , बूडा ठाडा लोग |
कर्जो काळो नाग हे , लख उपजावे रोग ||
लख उपजावे रोग , मूंगी आवे दवाई |
आंसू ढळता जाय , लोग हुणे लुगाई ||
के 'वाणी' कविराज , मले मूंडा मचकाता|
छिप छिप काढे दांत , भायला जाता जाता ||


कवि अमृत'वाणी'

झटपट बरसादो पाणी





झटपट बरसादो पाणी