राजस्थानी कविता कोष
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काळा-काळा बादळा
काळा
-
काळा
बादळा
,
गांवा
-
गांवा
जाय
।
खेतां
-
खेतां
बावणी
,
मोर
-
पपैया
गाय
।।
मोर
-
पपैया
गाय
,
पाणी
ईमरत
धारा
।
बेतो
-
बेतो
जाय
,
कहावे
नंदी
नारा
।
के
‘
वाणी
’
कविराज
,
चाल्या
ओरवा
वाळा
।।
कोठ्यां
भरदो
धान
,
बादळा
काळा
-
काळा
।।
आंबा वाया मोकळा
आम्बा
वाया
मोकळा
,
देशी
नाक्यो
खाद
।
पोता
-
पोती
खावता
,
मने
करेगा
याद
।।
मने
करेगा
याद
,
गजब
का
हा
दादाजी
।
ग्या
बेकुंठा
माय
,
कहे
धरती
माताजी
।।
के
‘
वाणी
’
कविराज
,
होचजो
लोग
-
लुगाया
।
कुण
-
कुण
करसी
याद
,
थां
कई
आम्बा
वाया
।।
करगेंट्या के न्यान
जीत गयो र जीत गयो , वोटां वाळी जीत ।
ढोल-नगाड़ा आज से , गावे थांका गीत ।।
गावे थांका गीत , खुशबू वाळी माळा ।
या तो मनखां जीत ,था मती करिजो छाळा ।।
के ’वाणी’ कविराज , जा‘गा बारा के भाव ।
करगेंट्या के न्यान ,जो बदल दिया थां भाव ।।
लेखक :- अमृत'वाणी'
कर्जो काळो नाग हे
जाता
जाता
के
गया
,
बूडा
ठाडा
लोग
|
कर्जो
काळो
नाग
हे
,
लख
उपजावे
रोग
||
लख
उपजावे
रोग
,
मूंगी
आवे
दवाई
|
आंसू
ढळता
जाय
,
लोग
हुणे
न
लुगाई
||
के
'
वाणी
'
कविराज
,
मले
मूंडा
मचकाता
|
छिप
छिप
काढे
दांत
,
भायला
जाता
जाता
||
कवि अमृत'वाणी'
झटपट बरसादो पाणी
झटपट बरसादो पाणी
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