हार्या केड़े

हार्या केड़े देखजो , कठे-कठे ही खोट ।
कतरा जिगरी कर गया ,हरता-फरता चोट ।।
हरता-फरता चोट ,उड़ाग्या मूंडा रा रंग ।
हाल-चाल बेहाल , कदी न कर ऐसो संग ।।
के ’वाणी’ कविराज, जद दारू-पाणी नेड़े ।
पी-पी के जो जाय , आय कुण हार्या केड़े ।।



चुनावी डूंज वायरो

चुनावी डूंज वायरो , पांच बरस में आय ।
उड़े रोड़्या रो कचरो, मंदर उॅंचों जाय ।।
मंदर ऊँचो जाय , वे पेर गळा में हार ।
आवे विरला जीत , मोड़-मोड़ पे मनवार ।।
के ’वाणी’ कविराज ,राखजो काण कायदो ।
पाछा जावो जीत , चालसी डूंज वायरो ।।




लेखक :- अमृत 'वाणी'

काळा-काळा बादळा

काळा-काळा बादळा, गांवा-गांवा जाय
खेतां-खेतां बावणी, मोर-पपैया गाय ।।
मोर-पपैया गाय , पाणी ईमरत धारा
बेतो-बेतो जाय , कहावे नंदी नारा
केवाणीकविराज , चाल्या ओरवा वाळा ।।
कोठ्यां भरदो धान, बादळा काळा-काळा ।।



आंबा वाया मोकळा

आम्बा वाया मोकळा , देशी नाक्यो खाद
पोता-पोती खावता , मने करेगा याद ।।
मने करेगा याद , गजब का हा दादाजी
ग्या बेकुंठा माय , कहे धरती माताजी ।।
केवाणीकविराज, होचजो लोग-लुगाया
कुण-कुण करसी याद, थां कई आम्बा वाया ।।


करगेंट्या के न्यान

जीत गयो र जीत गयो , वोटां वाळी जीत ।
ढोल-नगाड़ा आज से , गावे थांका गीत ।।
गावे थांका गीत , खुशबू वाळी माळा ।
या तो मनखां जीत ,था मती करिजो छाळा ।।
के ’वाणी’ कविराज , जा‘गा बारा के भाव ।
करगेंट्या के न्यान ,जो बदल दिया थां भाव ।।






लेखक :- अमृत'वाणी'